कुछ मुख़्तलिफ़ गुफ़्तगू (Hindi Edition)

इसमें लेखक के कुछ अलग अलग मिज़ाज, कुछ आस पास के माहोल से उठती कोफ़्त, कुछ अनसुलझे रिश्ते, कुछ माज़ी की लकीरें- चाहे वो रंजिशों के मसौदे हों या फिर मशरूम की तरह फैलती जरूरतें- ऐसे कई बातें जो सवाल भी करती हैं और कई बार इन बातों के सिरों को खुला छोड़ देती हैं| नज़्में कहने से लेखक कुछ संकोच कर रहा है शायद इसमें क़ाफिआ या फिर रिदॅम दिख नहीं रही| ये कुछ वाकये शायद सर्चलाईट में पिछले कुछ अरसे से कुछ तलाश में हैं| चलो क्यूँ न इसे गुफ़्तगू कह दिया जाये-कुछ अलग सी गुफ़्तगू और इसी से नाम आया “कुछ मुख़तलिफ़ गुफ़्तगू”

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इसमें लेखक के कुछ अलग अलग मिज़ाज, कुछ आस पास के माहोल से उठती कोफ़्त, कुछ अनसुलझे रिश्ते, कुछ माज़ी की लकीरें- चाहे वो रंजिशों के मसौदे हों या फिर मशरूम की तरह फैलती जरूरतें- ऐसे कई बातें जो सवाल भी करती हैं और कई बार इन बातों के सिरों को खुला छोड़ देती हैं| नज़्में कहने से लेखक कुछ संकोच कर रहा है शायद इसमें क़ाफिआ या फिर रिदॅम दिख नहीं रही| ये कुछ वाकये शायद सर्चलाईट में पिछले कुछ अरसे से कुछ तलाश में हैं| चलो क्यूँ न इसे गुफ़्तगू कह दिया जाये-कुछ अलग सी गुफ़्तगू और इसी से नाम आया “कुछ मुख़तलिफ़ गुफ़्तगू”

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