101 Laghukathayen

प्रतिष्ठित लेखक डॉ. विजय अग्रवाल की ये लघुकथाएँ स्वयं पर लगाए जानेवाले इस आरोप को झुठलाती हैं कि लघुकथाएँ लघु तो होती हैं, लेकिन उनमें कथा नहीं होती। इस संग्रह की लघुकथाओं में कथा तो है ही, साथ ही उन्हें कहने के ढंग में भी ‘कहन’ की शैली है। इसलिए ये छोटी-छोटी रचनाएँ पाठक के अंतर्मन में घुसकर वहाँ बैठ जाने का सामर्थ्य रखती हैं। ये लघुकथाएँ मानव के मन और मस्तिष्क के द्वंद्वों तथा उनके विरोधाभासों को जिंदगी की रोजमर्रा की घटनाओं और व्यवहारों के माध्यम से हमारे सामने लाती हैं। इनमें जहाँ भावुक मन की तिलमिलाती हुई तरंगें मिलेंगी, वहीं कहीं-कहीं तल में मौजूद विचारों के मोती भी। पाठक इसमें मन और विचारों के एक ऐसे मेले की सैर कर सकता है, जहाँ बहुत सी चीजें हैं—और तरीके एवं सलीके से भी हैं। इस संग्रह की विशेषता है— सपाटबयानी की बजाय किस्सागोई। निश्चय ही ये लघुकथाएँ सुधी पाठकों को कुरेदेंगी, गुदगुदाएँगी और सोचने पर विवश करेंगी।.

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भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी डॉ. विजय अग्रवाल वर्षों तक पूर्व राष्‍ट्रपति/ उपराष्‍ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा के निजी सचिव रहे हैं। सन् 1983 में केंद्रीय सिविल सेवा में आने के बाद भी डॉ. विजय अग्रवाल की एम.ए. (हिंदी साहित्य) एवं पी-एच.डी. की पृष्‍ठभूमि लगातार अपना काम करती रही। फलस्वरूप वे साहित्य के अध्ययन, अध्यापन एवं लेखन से आज तक जुड़े हुए हैं। साहित्य, भाषा, संस्कृति, यात्रा-संस्मरण, व्यंग्य, बाल साहित्य, लोककथा, इतिहास तथा जीवन-प्रबंधन आदि पर उनकी अब तक लगभग 75 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। कुछ पुस्तकों के अंग्रेजी और मराठी भाषा में अनुवाद भी हुए हैं। केंद्र सरकार के विभिन्न पदों पर काम करते हुए आप वर्तमान में प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो, भोपाल (मध्य प्रदेश) में अपर महानिदेशक के पद पर हैं।.

प्रतिष्ठित लेखक डॉ. विजय अग्रवाल की ये लघुकथाएँ स्वयं पर लगाए जानेवाले इस आरोप को झुठलाती हैं कि लघुकथाएँ लघु तो होती हैं, लेकिन उनमें कथा नहीं होती। इस संग्रह की लघुकथाओं में कथा तो है ही, साथ ही उन्हें कहने के ढंग में भी ‘कहन’ की शैली है। इसलिए ये छोटी-छोटी रचनाएँ पाठक के अंतर्मन में घुसकर वहाँ बैठ जाने का सामर्थ्य रखती हैं। ये लघुकथाएँ मानव के मन और मस्तिष्क के द्वंद्वों तथा उनके विरोधाभासों को जिंदगी की रोजमर्रा की घटनाओं और व्यवहारों के माध्यम से हमारे सामने लाती हैं। इनमें जहाँ भावुक मन की तिलमिलाती हुई तरंगें मिलेंगी, वहीं कहीं-कहीं तल में मौजूद विचारों के मोती भी। पाठक इसमें मन और विचारों के एक ऐसे मेले की सैर कर सकता है, जहाँ बहुत सी चीजें हैं—और तरीके एवं सलीके से भी हैं। इस संग्रह की विशेषता है— सपाटबयानी की बजाय किस्सागोई। निश्चय ही ये लघुकथाएँ सुधी पाठकों को कुरेदेंगी, गुदगुदाएँगी और सोचने पर विवश करेंगी।.

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