Dr. Ambedkar Rajneeti, Dharm Aur Samvidhan Vichar

भारत में लोकतंत्र है या नहीं है, सच क्या है? जब तक लोकतंत्र को गणराज्य से जोड़ने या लोकतंत्र को संसदीय सरकार से जोड़ने से पैदा हुई गलत फहमी दूर नहीं हो जाती, इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं दिया जा सकता। भारतीय समाज व्यक्तियों से नहीं बना है। यह असंख्य जातियों के संग्रहण से बना है, जिनकी अलगअलग जीवनशैली है और जिनका कोई साझा अनुभव नहीं है तथा न ही आपस में लगाव या सहानुभूति है। इस तथ्य को देखते हुए इस बिंदु पर बहस करने का कोई मतलब नहीं है। समाज में जातिव्यवस्था समाज में उन आदर्शों की स्थापना तथा लोकतंत्र की राह में अवरोध है। —इसी संग्रह से डॉ. बाबासाहब आंबेडकर एक राष्ट्रीय नेता थे। उन्हें मात्र दलित नेता कहना, उनकी विद्वत्ता, जनआंदोलनों, सरकार में उनकी भूमिका के साथ न्याय नहीं होगा। युगों पुरानी जाति आधारित अन्यायपूर्ण और भेदभावकारी समाज में सामाजिक समानता और सांस्कृतिक एकता के जरिए लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का उनका व्यापक दृष्टिकोण जगजाहिर है। मानवाधिकारों के राष्ट्रवादी और साहसी नेता के रूप में उनके भाषणों में आधुनिक भारत की सामाजिक चेतना को जगाने के लिए उनके जीवनपर्यंत समर्पण की झलक मिलती है। लोकतंत्र के प्रबल हिमायती डॉ. भीमराव आंबेडकर के लोकतंत्र, राजसत्ता तथा शासनप्रशासन के विषय में दिए पथप्रदर्शन करनेवाले भाषणों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकलन।.

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जानेमाने अर्थशास्त्री, नीतिनिर्माता, शिक्षाशास्त्री, समाजविज्ञानी और सुप्रसिद्ध लेखक नरेंद्र जाधव ने 22 पुस्तकों का लेखन/संपादन किया है, जिनमें रवींद्रनाथ ठाकुर पर तीन भाग (ग्रंथावली), रिइमर्जिंग इंडिया, मॉनीटरी पॉलिसी, फाइनेंशियल स्टेबिलिटी एंड सेंट्रल बैंकिंग इन इंडिया, अनटचेबिल्स (सीमोन एंड शूस्टर, अमेरिका), आउटकास्ट—ए मेमॉयर (पेंग्विन, भारत) और मॉनीटरी इकोनॉमिक्स फॉर इंडिया शामिल हैं। इनके अतिरिक्त 27 प्रमुख सरकारी रिपोर्टें तथा पत्रिकाओं में 100 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित एवं राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनेक व्याख्यान दिए हैं। अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त है। संप्रति योजना आयोग के सदस्य (केंद्रीय राज्य मंत्री का दरजा) के रूप में शिक्षा, श्रमरोजगार, सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण विषयों को मुख्य रूप से देखते हैं। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के सदस्य भी हैं। डॉ. जाधव को अर्थशास्त्र, शिक्षा, साहित्य, संस्कृति तथा सामाजिक कार्यों के लिए अब तक 55 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें चार मानद डी.लिट. उपाधियाँ और फ्रांस सरकार से मिली कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ एकेडमिक पाम्स प्रमुख हैं।.

भारत में लोकतंत्र है या नहीं है, सच क्या है? जब तक लोकतंत्र को गणराज्य से जोड़ने या लोकतंत्र को संसदीय सरकार से जोड़ने से पैदा हुई गलत फहमी दूर नहीं हो जाती, इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं दिया जा सकता। भारतीय समाज व्यक्तियों से नहीं बना है। यह असंख्य जातियों के संग्रहण से बना है, जिनकी अलगअलग जीवनशैली है और जिनका कोई साझा अनुभव नहीं है तथा न ही आपस में लगाव या सहानुभूति है। इस तथ्य को देखते हुए इस बिंदु पर बहस करने का कोई मतलब नहीं है। समाज में जातिव्यवस्था समाज में उन आदर्शों की स्थापना तथा लोकतंत्र की राह में अवरोध है। —इसी संग्रह से डॉ. बाबासाहब आंबेडकर एक राष्ट्रीय नेता थे। उन्हें मात्र दलित नेता कहना, उनकी विद्वत्ता, जनआंदोलनों, सरकार में उनकी भूमिका के साथ न्याय नहीं होगा। युगों पुरानी जाति आधारित अन्यायपूर्ण और भेदभावकारी समाज में सामाजिक समानता और सांस्कृतिक एकता के जरिए लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का उनका व्यापक दृष्टिकोण जगजाहिर है। मानवाधिकारों के राष्ट्रवादी और साहसी नेता के रूप में उनके भाषणों में आधुनिक भारत की सामाजिक चेतना को जगाने के लिए उनके जीवनपर्यंत समर्पण की झलक मिलती है। लोकतंत्र के प्रबल हिमायती डॉ. भीमराव आंबेडकर के लोकतंत्र, राजसत्ता तथा शासनप्रशासन के विषय में दिए पथप्रदर्शन करनेवाले भाषणों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकलन।.

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