Paschimi Gyanodyay ke Vaicharik Sankat (पश्चिमी ज्ञानोदय के वैचारिक संकट)

यह पुस्तक पश्चिमी ज्ञानोदय की अवधारणा और उससे प्रभावित समकालीन विमर्शों का एक आलोचनात्मक विश्लेषण करती है। तकनीक, संगठन और भौतिकवादी जीवन के सैद्धांतिक अवलोकन के साथ गाँधी और पाश्चात्य विमर्शों की तुलना को प्रस्तुत करती है। यह बताती है कि समृद्धि से समानता प्राप्त करने का लक्ष्य खोखला साबित हो रहा है। इस लक्ष्य के भ्रामक दावों को उत्तर-आधुनिकतावाद, नारीवाद, बहुसांस्कृतिवाद और समकालीन मार्क्सवाद भी बढ़ावा दे रहे हैं। तकनीकी विश्वदृष्टि में अस्तित्वात्मक मानवीय समस्याओं का अनुभवमूलक समाधान तो है जिसमें अनेक पाश्चात्य विद्वान आकंठ डूबे भी रहे हैं पर वह मानव का अवमूल्यन किए बिना संभव नही है। सभ्यता विमर्श की दृष्टि से उपरोक्त विमर्शों पर उठने वाले सवाल किस तरह से गाँधी विमर्श को केंद्र में ला रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक समकालीन पाश्चात्य विमर्शों के इन्ही उहापोहों को समालोचनात्मक तरीके से उद्घाटित करती है। English translation this book is a discursive intervention in reconceptualising and contextualising the multifaceted impact of Western enlightenment. It interrogates, from the perspective of Indian world-views and wisdom traditions-such as that of Gandhi’s Hind swaraj-the discourses of liberation inherent in the tradition of enlightenment or post-Enlightenment culture and society. The author in this book highlights the ruptures and gaps in Western discourses such as those of modernity, poststructuralism, postmodernism, de construction, nihilism, feminism, and multiculturalism, while also addressing the anomalies within these frameworks using Indian discursive perspectives which are dhrama centric yet open ended. The author in this book uses a comparative lens to expand the scope of Gandhi’s Hind Swaraj with respect to enlightenment thought in order to examine issues of equality, freedom, wealth generation- distribution, industrial society and its epistemology.

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About the Author

डॉ. विश्वनाथ मिश्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के आर्य महिला पी.जी. कॉलेज में अध्यापन करते हैं। वे समकालीन राजनीतिक सिद्धांत तथा अंतरराष्ट्रीय संबंध विषयों के अध्येता हैं।
English Translation
Vishwanath Mishra is Assistant Professor in Political Science at Arya Mahila Post Graduate College, Banaras Hindu University, Varanasi, Uttar Pradesh.

यह पुस्तक पश्चिमी ज्ञानोदय की अवधारणा और उससे प्रभावित समकालीन विमर्शों का एक आलोचनात्मक विश्लेषण करती है। तकनीक, संगठन और भौतिकवादी जीवन के सैद्धांतिक अवलोकन के साथ गाँधी और पाश्चात्य विमर्शों की तुलना को प्रस्तुत करती है। यह बताती है कि समृद्धि से समानता प्राप्त करने का लक्ष्य खोखला साबित हो रहा है। इस लक्ष्य के भ्रामक दावों को उत्तर-आधुनिकतावाद, नारीवाद, बहुसांस्कृतिवाद और समकालीन मार्क्सवाद भी बढ़ावा दे रहे हैं। तकनीकी विश्वदृष्टि में अस्तित्वात्मक मानवीय समस्याओं का अनुभवमूलक समाधान तो है जिसमें अनेक पाश्चात्य विद्वान आकंठ डूबे भी रहे हैं पर वह मानव का अवमूल्यन किए बिना संभव नही है। सभ्यता विमर्श की दृष्टि से उपरोक्त विमर्शों पर उठने वाले सवाल किस तरह से गाँधी विमर्श को केंद्र में ला रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक समकालीन पाश्चात्य विमर्शों के इन्ही उहापोहों को समालोचनात्मक तरीके से उद्घाटित करती है। English translation this book is a discursive intervention in reconceptualising and contextualising the multifaceted impact of Western enlightenment. It interrogates, from the perspective of Indian world-views and wisdom traditions-such as that of Gandhi’s Hind swaraj-the discourses of liberation inherent in the tradition of enlightenment or post-Enlightenment culture and society. The author in this book highlights the ruptures and gaps in Western discourses such as those of modernity, poststructuralism, postmodernism, de construction, nihilism, feminism, and multiculturalism, while also addressing the anomalies within these frameworks using Indian discursive perspectives which are dhrama centric yet open ended. The author in this book uses a comparative lens to expand the scope of Gandhi’s Hind Swaraj with respect to enlightenment thought in order to examine issues of equality, freedom, wealth generation- distribution, industrial society and its epistemology.

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